Hindi:
दूसरे भाव में चंद्रमा
कुछ प्राचीन ग्रंथों में जिक्र आता है कि जिसके शुभ चंद्रमा दूसरे भाव में हो, वह व्यक्ति अगले जन्म में ब्राह्मण के घर जन्म पाएगा और हीरों की खानों का मालिक होगा। वास्तव में, यहाँ अर्थ यह है कि ऐसा व्यक्ति अगले जन्म में बहुत अच्छा विद्वान, धर्म में रुचि रखने वाला तथा आर्थिक स्थिति में बहुत अच्छी हालत में रहेगा।
इसका तर्क यह है कि दूसरा घर, लाल किताब के अनुसार, बृहस्पति का पक्का घर है, जो ज्ञान और धर्म का कारक है। कालपुरुष कुंडली के अनुसार दूसरे घर में शुक्र की राशि आती है और शुक्र धन तथा जीवन में हर प्रकार की शान-शौकत का कारक है। यदि आदमी की आर्थिक हालत अच्छी रहेगी, तभी वह अपने जीवन में खानों का मालिक, अमीर या आर्थिक हालत में अच्छी स्थिति वाला हो सकता है।
कर्क लग्न में दूसरे घर में बैठा हुआ चंद्रमा, बृहस्पति और शुक्र दोनों ही ग्रहों के प्रभाव के कुछ-न-कुछ अंश अपने में ले लेता है। शायद इसीलिए बहुत से ग्रंथकारों ने दूसरे घर में बैठे चंद्रमा को अच्छा ही माना है। आमतौर पर ऐसा व्यक्ति अच्छे परिवार में जन्म लेता है। अच्छे परिवार से मेरा मतलब केवल आर्थिक उन्नति से नहीं, बल्कि संस्कारों के लिहाज से भी है। ऐसे व्यक्ति के बचपन का वातावरण शुभ रहता है।
लाल किताब में जिक्र आता है कि दूसरे घर में चंद्रमा होने से व्यक्ति को अपने माता-पिता की जायदाद का लाभ होता है या उनसे जायदाद या धन प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्ति को माता-पिता का सुख लंबे समय तक प्राप्त होता है। इसका कारण यह है कि दूसरा घर कुटुंब का घर है, इसलिए माता-पिता का सुख तथा कुटुंब में शांति का मिलना स्वाभाविक बात ही है। यहाँ पर यह जिक्र करना भी जरूरी है कि जिसके दूसरे घर में चंद्रमा हो, वह आमतौर पर औलाद से वंचित नहीं रहता।
कश्मीर के एक प्राचीन ज्योतिषी श्री जयदेव ने अपने महान ज्योतिष ग्रंथ ‘जातक-चंद्रिका’ में लिखा है कि यदि दूसरे स्थान में पूर्ण चंद्रमा हो तो ऐसे व्यक्ति को पुत्र-सुख, अन्न-सुख और कुटुंब-सुख बहुत अच्छी मात्रा में मिलता है। लेकिन यदि यह चंद्रमा क्षीण हो तो उसकी बुद्धि में कमी होना तथा धन की अड़चनों का भी सामना करना पड़ता है।
मेरे विचार में यहाँ अकेला चंद्रमा थोड़ा क्षीण भी हो तो भी इसके इतने अशुभ फल देखने में नहीं आते। इसी विचार को आगे प्रकट करते हुए ‘जातक-रत्नग्रंथ’ में जिक्र आता है कि इस स्थान में चंद्रमा होने से व्यक्ति धनी तो होता है, किंतु उसके अपने धन में एक विशेष प्रकार की बरकत भी रहती है।
इसी ग्रंथ में यह जिक्र भी आता है कि ऐसे व्यक्ति की बहन या कन्या से उसके धन का नाश होता है। यह वर्णन वास्तव में सच्चाई के नजदीक नहीं है, क्योंकि दूसरे घर का कन्या यानी बुध अथवा बहन से कोई संबंध नहीं है। कालपुरुष कुंडली के अनुसार यहाँ शुक्र की राशि आती है तथा लाल किताब के अनुसार भी यह बृहस्पति का पक्का घर है। इसलिए बहन या कन्या के द्वारा धन का नाश होगा, तर्कयुक्त नहीं लगता।
एक और ग्रंथ ‘हिल्लाजातक’ में जिक्र आता है कि धन स्थान में चंद्रमा के होने से व्यक्ति की 27 वर्ष की आयु में धन का विशेष लाभ होता है। मेरा विचार है कि यदि यहाँ बैठे चंद्रमा पर किसी अशुभ ग्रह यानी राहु-केतु तथा शनि की दृष्टि अष्टम स्थान से न पड़ती हो, तो व्यक्ति को 27वें वर्ष में धन का लाभ होना बहुत हद तक ठीक लगता है।
इसका कारण यह है कि लाल किताब के सिद्धांत के अनुसार कालपुरुष कुंडली से दूसरे घर में शुक्र की राशि पड़ती है और शुक्र व्यक्ति की 27 वर्ष की आयु में अपना पूरा प्रभाव दिखाता है। शुक्र धन का कारक है और बृहस्पति का पक्का घर होने से यह धन स्थान हुआ। साथ में बृहस्पति को भी कुबेर यानी धन का देवता माना गया है। इसलिए ऐसे व्यक्ति को 27वें वर्ष में धन का लाभ होना ठीक लगता है।
दूसरा घर हमारी वाणी का कारक भी है। शायद इसीलिए यवन ग्रंथों में बार-बार जिक्र आता है कि दूसरे घर में चंद्रमा होने से व्यक्ति मिष्टभाषी यानी मीठी भाषा बोलने वाला और लोकप्रिय होता है तथा अपने जीवन-संघर्ष में वह विजय प्राप्त करता है और उसके जीवन में ज्यादा संघर्ष की संभावना भी कम ही रहती है। यवन मत का यह विचार बहुत ठीक प्रतीत होता है।
कुछ लोगों का विचार है कि कर्क लग्न में दूसरे घर में चंद्रमा होने से व्यक्ति को स्त्रियों से अच्छी सहायता मिलती है। वास्तव में, यह सिद्धांत पुरुषों की कुंडली में ठीक प्रतीत होता है। क्योंकि कालपुरुष कुंडली के अनुसार दूसरे घर में शुक्र की राशि आती है और शुक्र अपनी पत्नी के अलावा दूसरी स्त्रियों का कारक भी है।
यहाँ पर हमें इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए कि कर्क लग्न में दूसरे घर में सूर्य की सिंह राशि पड़ती है। सिंह राशि का स्वामी सूर्य हमारे राजदरबार व बड़े लोगों का कारक है। इसीलिए ऐसे व्यक्ति को स्त्रियों से विशेष तौर पर सहायता मिलती है, जो धनवान हों या समाज में किसी-न-किसी रूप में प्रतिष्ठित हों।
ज्योतिष के कुछ ग्रंथों में यह जिक्र भी आता है कि दूसरे घर में चंद्रमा होने से व्यक्ति को अपने कुटुंब तथा अपने परिवार की जिम्मेदारी का कुछ भार अपने कंधों पर उठाना पड़ता है। वास्तव में, दूसरा घर हमारे कुटुंब का घर है, किंतु यहाँ पर यह देखना जरूरी होगा कि दूसरे घर में बैठा हुआ चंद्रमा शुभ स्थिति में है या नहीं।
यदि शुभ स्थिति में हो तो ऐसा व्यक्ति अपने परिवार के लोगों यानी माँ-बाप, बहन-भाई, बुआ आदि की अपनी खुशी से सहायता करता है और वह इस आर्थिक हालत में भी होता है कि इस सहायता का उस पर कोई कष्टदायी वजन नहीं पड़ता। लेकिन किसी कारण से यदि चंद्रमा अशुभ हो, तब इस प्रकार की जिम्मेदारी व्यक्ति को मजबूरी के साथ निभानी पड़ती है।
एक और ज्योतिषी कल्याण वर्मा ने मत प्रकट किया है कि वाणी के घर में चंद्रमा मधुर भाषा का कारक होने के साथ-साथ व्यक्ति को कम तथा संजीदगी से बोलने वाला बनाता है। यह मत बहुत ठीक प्रतीत होता है।
शायद यही कारण है कि कुछ ज्योतिषी यहाँ बैठे हुए शुभ चंद्रमा को वकीलों के लिए एक प्रकार का वरदान बताते हैं। इसका कारण यह है कि ऐसा वकील अपने पूरे धैर्य के साथ न्यायाधीश के सामने मधुर भाषा में किंतु तर्कपूर्ण जुबान में अपने मत को समझाकर अपने हक में फैसला करवाने की विशेष शक्ति रखता है।
लाल किताब में जिक्र आता है कि दूसरे घर में चंद्रमा होने से यानी धन-स्थान में चंद्रमा होने से व्यक्ति अपनी बुद्धि तथा हिम्मत से धन कमाता है। यदि ऐसे व्यक्ति का शुक्र भी शुभ स्थिति में हो तो ऐसा व्यक्ति अपने प्रेम-संबंधों में भी बहुत सफल रहता है और उसे किसी प्रकार की बदनामी होने का डर नहीं रहता।
उपाय के तौर पर बताया गया है कि ऐसा व्यक्ति यदि अपनी माता के जीवन के अंतिम समय आशीर्वाद के तौर पर माता से चावल लेकर अपने पास रखे तो उसका भाग्य विशेष तौर पर उदय होता है और आशीर्वाद पर दिए हुए चावल ऐसे व्यक्ति के लिए एक तरह से संजीवनी का काम करते हैं।
दूसरे घर में चंद्रमा होने के समय यदि आठवें घर में कोई शुभ ग्रह हो तो ऐसे व्यक्ति के ससुराल की हालत भी अच्छी होती है।
लाल किताब में यह जिक्र भी आता है कि जिस व्यक्ति के दूसरे घर में चंद्रमा हो, तो ऐसे व्यक्ति को पूजा के लिए घंटे-घड़ियाल, जो मंदिर में रखे जाते हैं, इनका रखना बहुत अशुभ फल देता है। इस कारण से कई बार व्यक्ति की औलाद पैदा ही नहीं होती या उसकी औलाद के लिए इसका फल बहुत अशुभ रहता है।
यदि किसी कारण से शनि-राहु-केतु की दृष्टि से चंद्रमा का फल खराब हो रहा हो तो हरे रंग के कपड़े मासूम कन्याओं को देते रहना चंद्रमा के अशुभ फल को बहुत हद तक दूर करता है।
यदि दूसरे घर में चंद्र-बृहस्पति होने के समय उनके साथ बुध या राहु का किसी भी तरह का संबंध हो तो दोनों का फल काफी मात्रा में अशुभ हो जाता है। ऐसी हालत में यदि व्यक्ति के घर उसकी साली रहे या साली उसके घर आए तो इसका बुरा प्रभाव पड़ता है।
दूसरे घर में चंद्रमा के साथ सूर्य का होना अच्छा फल देता है। इसका तर्क यह है कि कर्क लग्न वाले के दूसरे घर में सिंह राशि पड़ती है, इसलिए यहाँ चंद्रमा अपने मित्र सूर्य के साथ बैठा हुआ बहुत शुभ फल देता है। ऐसा व्यक्ति यदि सरकारी नौकरी करे तो वह अच्छा अफसर बन सकता है। चिकित्सकों के लिए भी यह एक अच्छा योग है। ऐसा व्यक्ति उन्नति व राजदरबार में सत्कार प्राप्त करता है। परंतु कई बार औरत रिश्तेदारों से बेकार में ही झगड़ा होने की संभावना भी रहती है। यदि इन पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्ति को स्त्रियों से किसी-न-किसी रूप में हानि होने का डर भी रहता है।
दूसरे घर में चंद्रमा के साथ शुक्र
लाल किताब में यह उल्लेख भी आता है कि ऐसे व्यक्ति को दवाइयों के काम से विशेष लाभ हो सकता है। बेशक वह हकीम न हो, यानी दवाइयों की दुकान भी करता हो तो इसका फल अच्छा होता है।
दूसरे घर में चंद्र-शुक्र की युति के समय यदि बृहस्पति कुंडली में शुभ न हो तो कई बार ऐसा व्यक्ति दूसरी औरतों से संबंध रखने पर अपना जीवन नष्ट कर सकता है या उसके जीवन में कई प्रकार की मुसीबतें आने का डर होता है।
दूसरे घर में चंद्रमा के साथ मंगल
दूसरे घर में यदि चंद्रमा के साथ मंगल हो तो यह योग व्यक्ति के धन के लिए तथा धन की बरकत के लिए शुभ असर देता है, किंतु किसी-न-किसी रूप से यह जातक की पत्नी के स्वास्थ्य पर कुछ मात्रा में अशुभ असर भी डाल सकता है।
दूसरे घर में चंद्रमा के साथ बुध
दूसरे घर में चंद्र के साथ बुध का होना व्यक्ति को कोई शुभ फल नहीं देता। ऐसे योग में पिता की आयु या अपनी आर्थिक स्थिति पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। किंतु यदि पिता के पास धन हो तो उसका लाभ प्राप्त करने में जातक को कोई कष्ट प्राप्त नहीं होता।
शायद इसका कारण यह है कि दूसरा घर बृहस्पति का पक्का घर है, इसलिए यहाँ बैठा बुध, बृहस्पति के प्रभाव में किसी-न-किसी तरह की कमी कर देता है।
दूसरे घर में चंद्रमा के साथ शनि
दूसरे घर में चंद्र के साथ शनि का होना कोई बहुत अच्छा योग नहीं है। कई बार इससे कुटुंब में पितृ-ऋण का योग भी पैदा होता है। यहाँ बैठे चंद्र-शनि के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए, आम लोगों के प्रयोग के लिए कुएँ आदि बनवाना इनके अशुभ असर को काफी मात्रा में दूर कर देता है।
यदि इन दोनों पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्ति के जीवन में कई प्रकार की दुर्घटनाएँ होने का डर भी रहता है।
दूसरे घर में चंद्रमा के साथ राहु
दूसरे घर में चंद्र-राहु इकट्ठे होने से व्यक्ति के धन के लिए अच्छा फल नहीं देते। ऐसे योग में पिता पर भी किसी-न-किसी प्रकार का अशुभ प्रभाव पड़ता है एवं कुटुंब की शांति के लिए भी यह योग अच्छा नहीं है।
यदि धन के लिए बहुत ही अशुभ प्रभाव पड़ रहा हो तो लाल किताब के अनुसार व्यक्ति चाँदी की ठोस गोली बनवाकर अपने पास रखे तो राहु का अशुभ प्रभाव कम हो जाता है। उसका स्वभाव या तासीर बदल जाती है, जिसके कारण वह चंद्रमा के असर को इतना खराब नहीं करता तथा धन में बरकत पैदा होने की संभावना रहती है।
दूसरे घर में चंद्रमा के साथ केतु
कर्क लग्न में दूसरे घर में चंद्र के साथ केतु का होना एक प्रकार से चंद्र-ग्रहण ही माना गया है। इसका कारण यह है कि कर्क लग्न में दूसरे घर में सूर्य की राशि आती है। इसलिए यहाँ चंद्र के साथ बैठा केतु केवल चंद्र के फल को ही खराब नहीं करता, बल्कि सूर्य के फल को भी कुछ मात्रा में खराब कर देता है।
यहाँ चंद्र-केतु होने के समय जातक को जोड़ों का दर्द या गठिया आदि होने की संभावना भी पैदा हो सकती है। इस हालत में यदि विद्यार्थी-जीवन में शिक्षा-प्राप्ति में कोई अड़चन पैदा हो रही हो तो उपाय के तौर पर धर्म-स्थान में केतु की चीजें यानी तीन केले अड़तालीस दिन लगातार देते रहना, केतु के इस जहर को दूर करेगा और चंद्र व राशि के मालिक सूर्य का फल कुछ मात्रा में और प्रबल हो जाएगा।
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English:
Moon in the Second House
Some ancient texts mention that a person with a benefic Moon in the second house will be born into a Brahmin family in their next life and will own diamond mines. In reality, the implication is that such a person will become a distinguished scholar, take a keen interest in religion, and enjoy a prosperous financial status in their next life.
The rationale behind this is that, according to the *Lal Kitab*, the second house is the permanent abode of Jupiter (*Brihaspati*), the significator of wisdom and religion. In the *Kaalpurush Kundli* (Universal Horoscope), the second house is ruled by Venus (*Shukra*), which signifies wealth and all forms of worldly luxury. Financial prosperity is a prerequisite for becoming wealthy, owning mines, or enjoying a high economic standing.
For a Cancer Ascendant (*Karka Lagna*), the Moon placed in the second house absorbs some influence from both Jupiter and Venus. Perhaps this is why many authors of astrological texts regard the Moon in the second house as auspicious. Typically, such a person is born into a good family—not merely in terms of financial prosperity, but also regarding values and upbringing. The atmosphere during their childhood remains auspicious.
The *Lal Kitab* mentions that the Moon in the second house enables a person to benefit from their parents' estate or inherit property and wealth from them. Such individuals enjoy the company and happiness of their parents for a long time. Since the second house represents the family (*kutumb*), experiencing parental happiness and domestic harmony is a natural outcome. It is also worth noting that a person with the Moon in the second house is generally blessed with progeny.
Shri Jaidev, an ancient astrologer from Kashmir, wrote in his seminal astrological text *Jatak-Chandrika* that if a full Moon (*Purna Chandra*) is situated in the second house, the person enjoys the happiness of having a son, abundance of food (*anna-sukh*), and family happiness in ample measure. However, if the Moon is weak or waning (*Ksheen Chandra*), the person may suffer from a lack of intellect and face financial obstacles. In my view, even if the Moon is somewhat weak when placed here, it does not produce significantly adverse effects. Elaborating on this, the *Jataka-Ratna-Grantha* mentions that while a person with the Moon in this position becomes wealthy, their wealth also possesses a special quality of abundance and growth.
The same text also mentions that such a person’s wealth is depleted due to their sister or daughter. However, this description does not align with reality, as the second house has no inherent connection to the daughter (represented by Mercury) or the sister. According to the *Kaalpurush Kundli* (Universal Horoscope), this house falls under the sign of Venus, and according to the *Lal Kitab*, it is the permanent house of Jupiter. Therefore, the idea that wealth would be lost through a sister or daughter does not seem logical.
Another text, *Hillajataka*, mentions that the presence of the Moon in the house of wealth leads to significant financial gain for the individual at the age of 27. I believe that if the Moon placed here is not aspected by malefic planets—specifically Rahu, Ketu, or Saturn—from the eighth house, then the prediction of financial gain in the 27th year holds considerable validity.
The reason for this is that, according to *Lal Kitab* principles, the second house of the *Kaalpurush Kundli* corresponds to the sign of Venus, and Venus exerts its full influence when a person reaches the age of 27. Venus is the significator of wealth, and since this is the permanent house of Jupiter, it serves as the house of wealth; furthermore, Jupiter is regarded as Kuber, the deity of wealth. Thus, it is plausible for such a person to experience financial gain in their 27th year.
The second house also governs one's speech. Perhaps this is why *Yavana* (Hellenistic/Greek) texts frequently mention that the Moon in the second house makes a person sweet-spoken and popular; they triumph in life's struggles, and the likelihood of facing excessive hardship is minimal. This perspective from the *Yavana* tradition appears quite sound.
Some hold the view that for an individual with Cancer Ascendant, having the Moon in the second house results in receiving substantial support from women. In reality, this principle appears to hold true specifically for the horoscopes of men. This is because, according to the *Kaalpurush Kundli* (Universal Horoscope), the second house is ruled by Venus, and Venus signifies not only one's wife but also other women.
It is also important to note that for the Cancer Ascendant (*Karka Lagna*), the second house falls under the sign of Leo (*Simha*), which is ruled by the Sun. The Sun signifies royal courts and influential people; consequently, such individuals receive significant assistance from women who are wealthy or hold a prestigious position in society.
Some astrological texts mention that the presence of the Moon in the second house requires the individual to shoulder the burden of responsibilities towards their extended family and immediate family. While the second house indeed represents the family, it is crucial to determine whether the Moon placed there is in a favorable (auspicious) position.
If the Moon is favorably placed, the individual willingly assists family members—such as parents, siblings, and paternal aunts—and is financially capable of doing so without feeling an undue or painful burden. However, if the Moon is afflicted or in an unfavorable position for any reason, the individual is compelled to fulfill these responsibilities out of necessity rather than choice.
Another astrologer, Kalyan Varma, has expressed the view that the Moon in the house of speech (*Vani Bhava*) not only fosters a sweet and pleasant manner of speaking but also makes the individual a person of few, yet serious and measured, words. This observation appears to be quite accurate.
Perhaps this is the reason why some astrologers consider a favorably placed Moon in this house to be a...
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