अर्थ: देवताओं के साथ युद्ध देखने आए परम प्रतापी महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम के पास जाकर उनसे कहा—
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ॥ ३ ॥
अर्थ: हे महाबाहो राम! वत्स, सुनो। यह एक सनातन गोपनीय स्तोत्र है, जिसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लोगे।
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम् ॥ ४ ॥
अर्थ: इस स्तोत्र का नाम 'आदित्यहृदय' है। यह परम पवित्र, समस्त शत्रुओं का नाश करने वाला, सदा विजय दिलाने वाला, अक्षय और परम कल्याणकारी है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥ ५ ॥
अर्थ: यह सब प्रकार के मंगलों का भी मंगल है, समस्त पापों का नाश करने वाला, चिंता और शोक को मिटाने वाला तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥ ६ ॥
अर्थ: भगवान सूर्य अपनी किरणों से सुशोभित और सर्वत्र उदय होने वाले हैं। देवता और असुर दोनों ही इन्हें नमस्कार करते हैं। तुम इन ब्रह्मांड के स्वामी, प्रकाश प्रकट करने वाले विवस्वान (सूर्य) की पूजा करो।
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥ ७ ॥
अर्थ: संपूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये परम तेजस्वी और अपनी किरणों से सबको सत्ता प्रदान करने वाले हैं। ये अपनी किरणों से देवता, असुर और संपूर्ण लोकों का पालन करते हैं।
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो अपाम्पतिः ॥ ८ ॥
अर्थ: यही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कार्तिकेय, प्रजापति, इंद्र, कुबेर, काल, यमराज, चंद्रमा और वरुण (जल के स्वामी) हैं।
पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥ ९ ॥
अर्थ: यही पितर, आठों वसु, साध्यगण, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, संपूर्ण प्रजा के प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले और प्रकाश के पुंज हैं।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्डकोंऽशुमान् ॥ ११ ॥
अर्थ: वे हरी (हरी घास जैसी कांति वाले) घोड़ों वाले, हजारों किरणों से सुशोभित (सहस्रार्चि), सात घोड़ों वाले रथ पर बैठने वाले (सप्तसप्ति), किरणों से युक्त (मरीचिमान), अंधकार का नाश करने वाले (तिमिरोन्मथन), कल्याण के कर्ता (शम्भु), जगत को गढ़ने वाले (त्वष्टा), ब्रह्मांड को चेतना देने वाले मार्ताण्ड और अंशुमान हैं।
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥ १२ ॥
अर्थ: वे हिरण्यगर्भ (सुवर्ण के समान कांति वाले), शिशिर (ऋतुओं में सुखद शीतलता देने वाले), तपन (तपाने वाले), भास्कर (प्रकाश करने वाले), रवि (स्तुति योग्य), अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले, अदिति के पुत्र और शीत का नाश करने वाले हैं।
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपाम्मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ॥ १३ ॥
अर्थ: वे आकाश के स्वामी, अंधकार को भेदने वाले, ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के पारगामी, भारी वर्षा करने वाले, जल के मित्र और आकाश मार्ग (विन्ध्य पर्वत की श्रेणी) में तीव्र गति से चलने वाले हैं।
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥ १४ ॥
अर्थ: वे धूप फैलाने वाले, गोल मंडल वाले, मृत्यु (शत्रुओं के काल), पिंगल (पीले-लाल मिश्रित वर्ण वाले), सबको तपाने वाले, सर्वज्ञ (कवि), संपूर्ण विश्व के स्वरूप, महातेजस्वी, सबके प्रति अनुरागी और संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति के कारण हैं।
अर्थ: हे सूर्यदेव! आप नक्षत्रों, ग्रहों और तारों के स्वामी हैं, पूरे विश्व की रक्षा करने वाले हैं, तेजस्वियों में भी परम तेजस्वी हैं और बारह रूपों (द्वादश आदित्य) में प्रकट होते हैं, आपको नमस्कार है।
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥ १६ ॥
अर्थ: पूर्व दिशा के उदयाचल पर्वत और पश्चिम दिशा के अस्ताचल पर्वत को नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (तारों और नक्षत्रों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको नमस्कार है।
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥ १७ ॥
अर्थ: आप जय स्वरूप और विजय देने वाले कल्याणकारी हैं। हरी घोड़ों वाले रथ पर चलने वाले आपको बार-बार नमस्कार है। हजारों किरणों वाले अदिति पुत्र सूर्यदेव आपको बार-बार नमस्कार है।
नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥ १८ ॥
अर्थ: उग्र रूप धारण करने वाले, शत्रुओं के लिए वीर और शीघ्र गति से चलने वाले आपको नमस्कार है। कमलों को खिलाने वाले मार्ताण्ड देव को बार-बार नमस्कार है।
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥ १९ ॥
अर्थ: आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी हैं। इस सूर्य रूप में आपका तेज अनुपम है। आप प्रकाश के पुंज, सबको भस्म कर देने वाले (प्रलय काल में) और रुद्र रूप शरीर वाले हैं, आपको नमस्कार है।
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥ २० ॥
अर्थ: आप अंधकार का नाश करने वाले, शीत (ठंड) को दूर भगाने वाले, शत्रुओं का संहार करने वाले, अनंत स्वरूप और कृतघ्नों (उपकार न मानने वालों) का नाश करने वाले हैं। प्रकाशमान नक्षत्रों के स्वामी आपको नमस्कार है।
तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥ २१ ॥
अर्थ: तपाये हुए सोने जैसी कांति वाले, अग्नि स्वरूप, विश्व का निर्माण करने वाले, अंधकार को पूरी तरह मिटाने वाले, प्रकाश स्वरूप और संसार के भले-बुरे कर्मों के साक्षी सूर्यदेव को नमस्कार है।
नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजती प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ २२ ॥
अर्थ: ये भगवान सूर्य ही प्रलय काल में समस्त चराचर जगत का नाश करते हैं और यही पुनः सृष्टि की रचना करते हैं। ये ही अपनी किरणों से जल सोखते हैं, तपाते हैं और वर्षा के रूप में जल बरसाते हैं।
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥ २३ ॥
अर्थ: सब प्राणियों के सो जाने पर भी ये उनके भीतर चेतना रूप में जागते रहते हैं। यही अग्निहोत्र यज्ञ हैं और यज्ञ करने वाले ऋषियों को मिलने वाला फल भी यही हैं।
वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानी कृत्यानी लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥ २४ ॥
अर्थ: समस्त वेद, यज्ञ और यज्ञों के फल तथा संसार में जितने भी कर्म या साधन हैं, उन सबके स्वामी यही भगवान सूर्य हैं।
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ २५ ॥
अर्थ: हे राघव! जो भी मनुष्य संकटों में, कठिनाइयों में, घने जंगलों में या किसी भी प्रकार के भय के समय इस स्तोत्र का कीर्तन (पाठ) करता है, वह कभी दुखी या हताश नहीं होता।
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥ २६ ॥
अर्थ: इसलिए तुम एकाग्रचित्त होकर इन देवाधिदेव जगत्पति सूर्य की पूजा करो। इस स्तोत्र का तीन बार पाठ करने से तुम इस महान युद्ध में अवश्य विजयी होगे।
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि।
एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥ २७ ॥
अर्थ: हे महाबाहो! तुम इसी क्षण रावण का वध करने में समर्थ हो जाओगे। ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य जैसे आए थे, वैसे ही चले गए।
एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥ २८ ॥
अर्थ: महर्षि अगस्त्य के इन वचनों को सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचंद्रजी का सारा शोक दूर हो गया। उन्होंने अत्यंत प्रसन्न होकर शुद्ध अंतःकरण से इस स्तोत्र को धारण (स्मरण) किया।
आदित्यं प्रेक्ष्य मुदितः परं हर्षमवाप्तवान्।
आचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥ २९ ॥
अर्थ: उन्होंने सूर्य देव की ओर देखकर आचमन किया, पवित्र हुए और परम हर्ष को प्राप्त होकर अपना धनुष हाथ में ले लिया।
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपस्थितः।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥ ३० ॥
अर्थ: फिर वे रावण को सामने देखकर बड़े उत्साह से युद्ध के लिए आगे बढ़े और पूरी शक्ति से उसका वध करने के लिए तत्पर हो गए।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥ ३१ ॥
अर्थ: उस समय देवताओं के बीच खड़े भगवान सूर्य ने अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीराम की ओर देखा। रावण के विनाश का समय निकट जानकर उन्होंने हर्षपूर्वक ऊंचे स्वर में कहा— "शीघ्रता करो!"
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