😱 पिता ने 3 बेटियों को घर से निकाल दिया... फिर भगवान जगन्नाथ खुद बालक बनकर पहुँचे! आगे जो हुआ, उसे पढ़कर आपकी आँखें नम हो जाएँगी...
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एक समय की बात है। ओडिशा की सीमा से लगे एक छोटे से गांव में हरिनारायण नाम का एक गरीब किसान अपनी पत्नी गौरी और अपनी तीन बेटियों के साथ रहता था। खेत छोटा था, आमदनी कम थी और जिम्मेदारियां बहुत बड़ी थीं। गौरी हमेशा अपनी बेटियों को भगवान जगन्नाथ का प्रसाद मानती थी, लेकिन हरिनारायण के मन में एक ही दुख था कि उसके घर बेटा नहीं हुआ। गांव के लोग भी उसे ताने देते रहते। कोई कहता, "तीन-तीन बेटियां हैं, बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा?" कोई हंसकर बोलता, "बेटियां तो पराया धन होती हैं।" धीरे-धीरे लोगों की बातें हरिनारायण के दिल में जहर की तरह उतरने लगीं।
गौरी रोज सुबह अपनी तीनों बेटियों को लेकर गांव के पुराने जगन्नाथ मंदिर जाती। वहां बैठकर वह भगवान से कहती, "प्रभु, मुझे धन नहीं चाहिए, बस मेरी बेटियों के मन में दया, सेवा और संस्कार कभी कम मत होने देना।" तीनों बच्चियां भी हाथ जोड़कर मासूम आवाज में कहतीं, "जय जगन्नाथ लल्ला।" मंदिर के बूढ़े पुजारी अक्सर मुस्कुराकर कहते, "जिस घर में ऐसी प्रार्थना होती है, वहां भगवान बिना बुलाए भी चले आते हैं।"
समय बीतता गया। बेटियां बड़ी होने लगीं। सबसे बड़ी बेटी हर घायल और भूखे इंसान की मदद करती। दूसरी बेटी गांव के बच्चों को पढ़ना सिखाती। सबसे छोटी बेटी हर शाम मंदिर जाकर भगवान से ऐसे बातें करती जैसे वे उसके सबसे अच्छे मित्र हों। वह कहती, "लल्ला, आज हमारे घर दाल पतली बनी है, लेकिन अगर तुम आओगे तो मां उसमें थोड़ा और पानी मिला देंगी। सब मिलकर खा लेंगे।"
एक दिन गांव में बड़ा अकाल पड़ा। खेत सूख गए। काम बंद हो गया। घर में कई-कई दिन तक चूल्हा नहीं जला। उसी रात हरिनारायण गुस्से में बोला, "अब मुझसे नहीं होगा। तीन-तीन बेटियों का बोझ मैं नहीं उठा सकता।" गौरी ने बहुत समझाया, लेकिन उसका मन कठोर हो चुका था। अगले ही दिन उसने तीनों बेटियों और गौरी का सामान बाहर रख दिया और भारी मन से कह दिया, "आज से तुम लोग इस घर में नहीं रहोगे।"
गौरी ने आंसुओं के साथ भगवान का नाम लिया, लेकिन पति को एक भी कठोर शब्द नहीं कहा। उसने अपनी बेटियों का हाथ पकड़ा और गांव के बाहर एक टूटी हुई झोपड़ी में रहने लगी। वहां न बिजली थी, न ढंग का खाना, लेकिन हर शाम भगवान जगन्नाथ का नाम जरूर गूंजता था। बेटियां भूखी रहतीं, फिर भी मां से कहतीं, "मां, पहले भगवान को भोग लगाओ, फिर हम खाएंगे।"
उसी रात जगन्नाथ मंदिर के पुजारी ने एक अद्भुत दृश्य देखा। भगवान के चरणों के पास रखा भोग आधा गायब था और मंदिर के बाहर छोटे-छोटे पैरों के निशान बने थे। पुजारी ने आश्चर्य से चारों ओर देखा। तभी उन्हें दूर एक सांवला, घुंघराले बालों वाला नन्हा बालक दिखाई दिया। वह मुस्कुराकर बोला, "बाबा, मां के घर खाना पहुंचाना था, इसलिए थोड़ा प्रसाद साथ ले गया।" इतना कहकर वह हंसता हुआ अंधेरे में ओझल हो गया।
उस दिन के बाद हर रात किसी न किसी तरह गौरी की झोपड़ी के बाहर अनाज, फल या दूध रखा मिलता। कभी कोई दिखाई नहीं देता। बस सुबह मंदिर में भोग थोड़ा कम मिल जाता। गौरी समझ चुकी थी कि यह उसके लल्ला की लीला है। वह हर बार हाथ जोड़कर कहती, "प्रभु, आप खुद क्यों कष्ट करते हैं?" और हवा में जैसे बच्चों की हंसी सुनाई देती।
साल बीतते गए। तीनों बेटियां अपने संस्कारों और सेवा भाव के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गईं। एक बेटी गांव की वैद्य बनी, दूसरी ने गरीब बच्चों के लिए पाठशाला शुरू की और तीसरी अनाथ बच्चों की सेवा करने लगी। बड़े-बड़े परिवार उनकी सादगी और संस्कार देखकर उन्हें अपनी बहू बनाना चाहते थे। विदाई के समय तीनों ने मां से कहा, "हम जहां भी रहेंगे, सबसे पहले आपकी सीख और लल्ला का नाम याद रखेंगे।"
उधर हरिनारायण का जीवन पूरी तरह बदल चुका था। जिस बेटे की चाह में उसने बेटियों को ठुकराया था, वह सपना कभी पूरा नहीं हुआ। समय के साथ उसकी जमीन बिक गई, शरीर कमजोर हो गया और जो रिश्तेदार कभी उसके साथ बैठते थे, वे भी मुंह मोड़ने लगे। एक रात तेज बारिश में वह गांव की सड़क पर अकेला बैठा रो रहा था। तभी एक छोटा सा बालक उसके सामने आकर बोला, "बाबा, घर चलोगे? बहुत देर से कोई तुम्हारा इंतजार कर रहा है।"
हरिनारायण ने कांपते हाथों से उस बच्चे का हाथ पकड़ लिया। न जाने क्यों उसके स्पर्श से उसे अजीब सा सुकून मिलने लगा। कुछ देर बाद वह उसी झोपड़ी के सामने पहुंचा, जहां कभी उसने अपनी पत्नी और बेटियों को छोड़ दिया था। उसने पीछे मुड़कर उस बालक को धन्यवाद कहना चाहा, लेकिन वहां कोई नहीं था। दूर मंदिर की घंटियां अपने आप बजने लगी थीं।
दरवाजा खुला। गौरी बाहर आई। उसने बिना कोई शिकायत किए अपने पति को सहारा देकर अंदर बैठाया। थोड़ी ही देर में तीनों बेटियां भी अपने-अपने परिवारों के साथ पहुंच गईं। किसी ने पिता से कोई प्रश्न नहीं किया। किसी ने पुराने घाव नहीं कुरेदे। सबने उनके पैर छुए और कहा, "बाबा, घर वापस आने में कभी देर नहीं होती।"
हरिनारायण फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने हाथ जोड़कर कहा, "मैंने बेटियों को बोझ समझा था। लेकिन आज समझ आया कि भगवान बेटियों के रूप में अपना सबसे बड़ा आशीर्वाद भेजते हैं। जिसने उन्हें ठुकराया, उसने खुद अपनी खुशियां ठुकराईं।"उसी रात गौरी को स्वप्न में भ
गवान जगन्नाथ बालक रूप में दिखाई दिए। वे मुस्कुराकर बोले, "मां, जहां क्षमा होती है, वहीं मेरा घर होता है। जिसने अपने दिल का द्वार खोल दिया, उसके जीवन का अंधेरा अपने आप मिट गया।"
अगली सुबह जब पूरा परिवार मंदिर पहुंचा तो भगवान जगन्नाथ के चरणों में तीन ताजे कमल रखे थे। बूढ़े पुजारी ने मुस्कुराकर कहा, "ये तीन कमल उन तीन बेटियों के लिए हैं जिन्होंने संसार को सिखाया कि सच्ची संतान वही होती है जो माता-पिता का साथ कठिन समय में भी नहीं छोड़ती।"
उस दिन से गांव में कोई भी बेटी को बोझ कहने का साहस नहीं कर पाया। लोग अपने बच्चों को यही कहानी सुनाकर समझाने लगे कि भगवान जगन्नाथ के दरबार में बेटा और बेटी का कोई भेद नहीं होता। वहां केवल प्रेम, सेवा और सच्चे संस्कारों का मूल्य होता है। और जहां सच्चा प्रेम होता है, वहां स्वयं लल्ला जगन्नाथ किसी न किसी रूप में अवश्य पहुंचते हैं।
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