रघुनाथ दास गोस्वामी ने कृष्ण भक्ति के लिए कैसे त्यागी अपार संपत्ति | How Raghunath Das Goswami Gave Up Wealth for Krishna Bhakti.
Hindi:
बंगाल में तीसबीघाके पास पहले एक सप्तग्राम नामक महासमृद्धिशाली प्रसिद्ध नगर था। इस नगरम् हिरण्यदास और गोवर्द्धनदास-ये दो प्रसिद्ध धनी महाजन रहते थे। दोनों भाई-भाई ही थे। ये लोग गौड़के तत्कालीन अधिपति सैयद हुसैनशाहका ठेकेपर लगान वसूल किया करते थे और ऐसा करनेमें बारह लाख रुपया सरकारी लगान भर देनेके बाद आठ लाख रुपय इनके पास बच जाता था।
आठ लाख वार्षिक आय कम् नहीं होती और वह भी उन दिनों! खैर, कहनेका मतलब यह कि ऐसे सम्पन्न घरमें रघुनाथदासका जन्म हुआ था हिरण्यदास सन्तानहीन थे और गोवर्द्धनदासके भ रघुनाथदासको छोड़कर और कोई सन्तान न थी। इस तरह दोनों भाइयोंकी आशाके स्थल एकमात्र यही थे।
खायें तो थोड़ा, पीयें तो थोड़ा और उड़ायें त थोड़ा - इस तरह बड़े लाड़-दुलारके साथ बालक रघुनाथदासका लालन-पालन हुआ। अच्छे-से-अच्छे विद्वान् पढ़ानेको रखे गये। बालक रघुनाथने बड़े चाव संस्कृत पढ़ना आरम्भ कर दिया और थोड़े ही समय उसने संस्कृतमें पूर्ण अभिज्ञता प्राप्त कर ली।
यही नहीं भाषाकी शिक्षाके साथ-साथ रघुनाथको उस सञ्जीवन बूटीका भी स्वाद मिल गया, जिसके संयोगसे विद्य वास्तविक विद्या बनती है। वह सञ्जीवनी बूटी है-भगवान्कीभक्ति। बात यह हुई कि अपने जिन कुलपुरोहित में श्रीबलराम आचार्यके यहाँ बालक रघुनाथ विद्याभ्यासके लिये जाता था, उनके यहाँ उन दिनों श्रीचैतन्य महाप्रभुके 5 परमप्रिय शिष्य श्रीहरिदासजी रहा करते थे। उनके सत्सङ्गसे हरिभक्तिकी एक पतली-सी धार उसके हृदयमें भी बह निकली।
उन्हीं दिनों खबर मिली कि श्रीचैतन्यदेव शान्तिपुर श्री अद्वैताचार्यके घर पधारे हुए हैं। ज्यों ही यह समाचार मिला त्यों ही आसपासके भक्तोंका दिल खिल उठा। रघुनाथ तो खबर पाते ही दर्शनके लिये छटपटा उठा। उसने शान्तिपुर जानेके लिये पितासे आज्ञा माँगी।
पिताके लिये यह एक अनावश्यक-सा प्रस्ताव था; पर जब उन्होंने देखा कि रघुनाथके चेहरेपर बेचैनी दौड़ रही है, तब उन्होंने उसे रोकना ठीक नहीं समझा और उसे एक राजकुमारकी भाँति बढ़िया पालकीमें बैठाकर, नौकर चाकरोंके दलके साथ शान्तिपुर भेज दिया। शान्तिपुरमें रघुनाथदास सीधा श्री अद्वैताचार्यके घर पहुँचा।
जाकर भेंटकी वस्तुओंके सहित गौरके चरणोंमें लोट-पोट हो गया। गौर इसे देखते ही ताड़ गये कि इसका भविष्य क्या है। फिर भी उन्होंने अनासक्तभावसे घर-गृहस्थी में रहते हुए भी भगवत्प्राप्ति की जा सकती है आदि उपदेश देकर आशीर्वादसहित घरके लिये वापस किया। रघुनाथघर वापस आ रहा था, पर उसे यह ऐसा कठिन मालूम पड़ रहा था जैसा नदीमें प्रवाहके विपरीत तैरना ।
अस्तु, किसी तरह हृदयकी उथल-पुथलके साथ वह घर आया और माता, पिता तथा ताऊके चरणों में प्रणाम किया पर उन्होंने देखा कि उसके चेहरेका रंग ही बदला हुआ है। घरवालोंको पछतावा हुआ कि इसे गौराङ्गके पास क्यों जाने दिया। खैर जो हुआ सो हुआ अब ऐसी गलती नहीं करनी चाहिये-ऐसा निश्चय करके उन्होंने अपने लड़केपर चौकी पहरा बैठा दिया।
शायद विवाह हो जानेसे मेरे बेटेका चित्त स्थिर हो जाय इस खयाल से श्रीगोवर्द्धनदास मजूमदारने झटपट व्यवस्था करके एक अत्यन्त रूपवती बालिकाके साथ अपने पुत्रका विवाह कर दिया। परंतु पीछे उनका खयाल गलत साबित हुआ। वह बार-बार घरसे निकल भागने का प्रयत्न करता और पहरेदार पकड़कर लौटा लाते।
धीरे-धीरे यह मामला इतना अधिक बढ़ा कि स्वजनोंकी सलाहसे माता-पिताने रघुनाथको पागलकी तरह रस्सीसे बँधवा दिया। परंतु पीछे विवेकने उन्हें समझाया कि बहुत कड़ा करके बाँधा हुआ बन्धन जब टूटता है, तब बात-की बातमें टुकड़े-टुकड़े हो जाता है। इसपर रघुनाथको पागलकी तरह बाँधनेका पागलपन उन्होंने त्याग दिया। हाँ, नजरकी चौकसी उन्होंने पूर्ववत् जारी रखी।
उन दिनों उस देशमें गौराङ्गके बाद यदि किसी महापुरुषके नामकी धूम भी तो यह थी श्रीनित्यानन्दके नामको। संन्यासी होकर अनेक देश देशान्तरोंमें परिभ्रमण करनेके बाद श्रीनित्यानन्दमहाराज श्रीगौराङ्गके शरणापत्र हुए थे और उन्होंको आज्ञासे वे गौड़ प्रदेशमें हरिनामका प्रचार कर रहे थे। उन्होंने पानीहाटी ग्रामको हरिनामप्रचारका प्रधान केन्द्र बना रखा था।
रघुनाथदासकी भी इच्छा यह आनन्द लूटने की हुई। पिताने भी रोक नहीं लगायो । उन्होंने भी अब 'रस्सा डील' नीतिसे काम लेना आरम्भ कर दिया पानी जैसे बिगड़े हुए घोड़ेको रसले सिर्फ छोरको मजबूती से पकड़े रहकर 'जायगा कहाँ, रस्सीका छोर तो हाथमें है यह सोचकर रस्सीको बिलकुल ढोला करके जी भरकर उछलने-कूदने के लिये उसे स्वतन्त्र कर दिया जाता है,
वैसे ही गोवर्द्धनदासने रघुनाथदासपरनिगाह रखनेवालोंको तो और अधिक सावधानी के साथ काम करनेका आदेश कर दिया था, पर ऊपरसे स्पष्ट दिखलायी देनेवाला बन्धन हटा लिया था। इसीलिये बड़ी खुशी के साथ रघुनाथदासको पानीहाटी जानेकी अनुमति मिल गयी। रघुनाथदास पानीहाटी गये, श्रीनित्यानन्दके दर्शनसे अपने नेत्रोंको सुख पहुँचाया और हरिनामसंकीर्तनकी ध्वनिसे अपने कर्णविवरोंको पावन किया।
यही नहीं, श्रीनित्यानन्दकी दयासे इन्हें समवेत असंख्य वैष्णवजनको दही चिउरेका महाप्रसाद चढ़ानेका भी सुअवसर प्राप्त हो गया। दूसरे दिन बहुत-सा दान-पुण्य करके श्रीनित्यानन्दजी से आज्ञा लेकर घरको आ गये।पर आ गये पर शरीरसे, मनसे नहीं इस कीर्तन समारोह में सम्मिलित होकर तो अब वे बिलकुल ही बेकाबू हो गये। इधर इन्होंने यह भी सुन रखा था कि गौड़ देशके सैकड़ों भक्त चातुर्मास्यभर श्रीचैतन्यचरणोंमें निवास करनेको नीलाचल जा रहे हैं इस स्वर्णसंयोगको वे किसी तरह हाथसे जाने देना नहीं चाहते थे।
एक दिन भगवत्प्रेरित महामायाने एक साथ सारे के सारे ड्योड़ीदारोंको निद्रामें डाल दिया और सवेरा होते न होते रघुनाथ महलकी चहारदीवारीसे निकलकर नौ-दो ग्यारह हो गये। इधर ज्यों ही मालूम हुआ कि रघुनाथ नहीं हैं तो सारे महलमें सनसनी फैल गयी। पूर्व पश्चिम, उत्तर, | दक्षिण- सभी दिशाओंको आदमी दौड़ पड़े पर वहाँ मिलनेको अब रघुनाथकी छाँह भी नहीं थी।
अनुमान किया गया कि कहीं पुरी ने गया हो। उन्होंने पाँच घुड़सवारोंको पुरीके रास्तेपर दौड़ा दिया पर वहाँ रघुनाथदास कहाँ थे? भगवान्ने उन्हें यह बुद्धि दी कि आम सड़क होकर जाना ठीक नहीं अनेक यात्रियोंसे भेंट होगी। पूछेंगे-कौन हो, कहाँसे आये? उन्हें क्या उत्तर दूंगा। बतलानेसे भेद खुलता है और उन यात्रियोंमें क्या मालूम कोई जान-पहचानका ही निकल आये और मेरे लिये खुफिया पुलिसका कर्मचारी बन बैठे सीधे ऊटपटांग जंगलके रास्तेसे जाना अच्छा है।
इसलिये वे पगडंडीके रास्तेसे गये और रात होते-होते प्राय: तीस मीलपर जा पहुँचे। इधर यात्रियोंका सङ्ग लेनेके बाद गोवर्द्धनदासके आदमियोंको जब शिवानन्दसे मालूम हुआ कि रघुनाथउनके साथ नहीं आये, तब हताश होकर वे लौट आये। सारे महलमें कुहराम मच गया। हितू मित्र-सभी आँसू बहाकर समवेदना प्रकट करते और समझाते कि सबका रक्षक एकमात्र ईश्वर है, इसलिये चिन्ता नहीं करनी चाहिये; पर उन्हें ढांढ़स न होता।
एक राजकुमार, जो कभी एक पग भी बिना सवारीके न चलता था, वह आज बड़े-बड़े विकट बटोहियोंके भी कान काट गया। उत्कट वैरागी रघुनाथको प्रथम दिनकी यात्रा समाप्त करनेके बाद एक ग्वालेके घरमें बसेरा मिला और उसके दिये हुए थोड़े-से दूधपर बसर करके दूसरे दिन बिलकुल तड़के फिर कूच कर दिया और इस तरह लंबी चलाई करके करीब एक महोनेका रास्ता रघुनाथने कुल बारह दिनोंमें तै कर डाला और इन बारह दिनोंमें उन्होंने कुल तीन बार रसोई बनाकर अपने उदरकुण्डमें आहुति दी।
इस प्रकार प्रभुसेवित नीलायलपुरीके दर्शन होते ही इन्होंने उसे नमस्कार किया और श्रीचरणोंकी ओर अग्रसर हुए। इनके हृदयमें न जाने क्या-क्या तरङ्गे उठ रही थीं। इसी प्रकार भावुकताके प्रवाहमें अलौकिक आनन्द लाभ करते हुए ये निश्चित स्थानके निकट जा पहुँचे। दूरसे ही इन्होंने देखा कि भक्तजनों से घिरे हुए श्रीचैतन्यदेव प्रमुख आसनपर विराजमान हैं। उस अलौकिक शोभासे युक्त मूर्तिका दर्शन करते ही रघुनाथका रोम-रोम खिल उठा। हर्षातिरेकसे उन्हें तन-वदनकी भी सुधि न रही। रघुनाथदास श्रीचरणोंके निकट पहुँच गये। सबसे पहले मुकुन्ददत्तकी निगाह उनपर पड़ी।
देखते ही उन्होंने कहा- 'अच्छा, रघुनाथदास, आ गये?' तुरंत ही गौरका भी ध्यान गया। वे प्रसन्नतासे खिल उठे। 'अच्छा, वत्स रघुनाथ! आ गये?" कहकर उनका स्वागत किया और उनके प्रणाम करनेके बाद झटसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक उन्हें उठाकर गले लगाया। पास बैठाकर उनके सिरपर हाथ फेरना शुरू किया।
रघुनाथको ऐसा मालूम पड़ा मानो उनकी रास्तेको सारी थकावट हवा हो गयी। महाप्रभुकी करुणाशीलता देखकर उनकी आँखोंसे श्रद्धा और प्रेमके आँसू बरस पड़े। उन्हें भी गौरने निज करकमलोंसे ही पछा इसके अनन्तर चैतन्यदेवने स्वरूपदामोदरको अपनेपास बुलाकर कहा कि 'देखो, मैं इस रघुनाथको तुम्हें सौंपता हूँ।
खान-पानसे लेकर साधन-भजनतक सारी व्यवस्थाका भार तुम्हारे ऊपर है, भला !' बहुत अच्छा ! कहकर स्वरूपने प्रभुकी आज्ञा शिरोधार्य की और रघुनाथको अपनी कुटीमें ले गये उनके समुद्र- खान करके वापस आनेपर उन्हें जगन्नाथजीका कई प्रकार प्रसाद और महाप्रसाद लाकर दिया। रघुनाथने उसे बड़े प्रेमसे पाया। परंतु जब उन्होंने देखा कि यह तो रोजका सिलसिला है, तब उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ। कि रोज-रोज यह बढ़िया-बढ़िया माल खानेसे वैराग्य कैसे सधेगा।
आखिर चार-पाँच दिनके बाद ही उन्होंने यह व्यवस्था बदल दी। 'मैं एक राजकुमारकी हैसियतका आदमी हूँ' इस प्रकारका रहा-सहा भाव भी भुलाकर वह साधारण भिक्षुककी भाँति जगन्नाथजीके सिंहद्वारपर खड़े होकर भिक्षावृत्ति करने लगे और बड़े आनन्दके साथ दिन व्यतीत करने लगे। जब लोगोंको मालूम हुआ कि ये बहुत बड़े घरके लड़के होकर भी इस अवस्थामें आ गये हैं, तब उन्हें अधिकाधिक परिमाणमें विविध प्रकारके पदार्थ देना आरम्भ कर दिया।
आखिर घबराकर रघुनाथदासको यह क्रम भी त्याग देना पड़ा। अब वह चुपचाप एक अत्रक्षेत्रमें जाते और वहाँसे रूखी-सूखी भीख ले आते रघुनाथकी गतिविधि क्या से क्या हो रही है, श्रीगीरादेवको पूरा पता लगता रहता। उनके दिन-दिन बढ़ते हुए वैराग्यको देखकर उन्हें बड़ा सुख मिलता। रघुनाथकी उत्कट जिज्ञासा देखकर श्रीमहाप्रभुने एक दिन उन्हें साधनसम्बन्धी कुछ उपदेश दिया। कहा कि मैं तुम्हें सब शास्त्रोंका सार यह बतलाता हूँ कि 'श्रीकृष्णके नामका स्मरण और कीर्तन ही संसारमें कल्याण प्राप्तिके सर्वश्रेष्ठ साधन हैं।
पर इस साधनकी भी पात्रता प्राप्त करनेके साधन ये हैं कि निरन्तर साधुसङ्ग करे, सांसारिक चर्चासे बचे, परनिन्दासे कोसों दूर रहे, स्वयं अमानी होकर दूसरोंका मान करे, किसीका दिल न दुखाये और दूसरेके दुखानेपर दुःखी न हो, आत्मप्रतिष्ठाको विष्ठावत् समझे, सरल और सच्चरित्र होकर जीवन व्यतीत करे, आदि।' रघुनाथदास इच्छा और अनिच्छासे जबतक राजकुमारथे, तबतक थे अब वह वैरागी बन गये हैं, इसलिये उनका वैराग्य भी दिन-दिन बड़े वेगसे बढ़ता जाता है।
पहले वे अन्नक्षेत्रमें जाकर भिक्षा ले आते थे; पर अब उन्होंने यह भी बंद कर दिया। कारण, भण्डारीको जैसे ही इनके वंश आदिका परिचय मिला, उसने भिक्षामें विशेषता कर दो। इसलिये इन्हें इस व्यवस्थाको भी त्यागकर नयी व्यवस्था करनी पड़ी। इसमें पूर्ण स्वाधीनता थी। जगन्नाथजीमें दूकानोंपर भगवान्का प्रसाद भात-दाल आदि बिकता है। यह प्रसाद बिकनेसे बचते-बचते कई-कई दिनका हो जानेसे सड़ भी जाता है।
सड़ जानेसे जब यह बिक्रीके कामका भी नहीं रहता, तब सड़क पर फेंक दिया जाता है, जिसे गौएँ आकर खा जाती हैं। रघुनाथदासको इस जीविकामें निर्द्वन्द्वता मालूम हुई। वे उसी फेंके हुए प्रसादमेंसे थोड़ा-सा बटोरकर ले आते और उसमें बहुत-सा जल डालकर उसे धोते और उसमें से कुछ साफ-से खाने लायक चावल निकाल लेते और नमक मिलाकर उसीसे अपने पेटकी ज्वाला शान्त करते। गौराङ्गदेवको इनकी इस प्रसादीका पता लगा तो वे एक दिन सायंकालको दबे पाँव रघुनाथके पास पहुँचे।
ज्यों ही उन्होंने देखा कि रघुनाथ प्रसाद पा रहे हैं तो जरा और भी दुबक गये और इसी तरह खड़े रहे; एकाएक बंदरकी तरह झपटकर छापा मारा। झटसे एक मुट्ठी भरके 'वाह बच्चू! मेरा निमन्त्रण बंद करके अब अकेले-ही-अकेले यह सब माल उड़ाया करते हो?' कहते हुए मुखमें पहुँचाया। ध्यान जाते ही 'वाह प्रभो ! यह क्या? इस पापसे मेरा निस्तार कैसे होगा।' कहकर झटसे रघुनाथने दोनों हाथोंसे पतली उठा ली, जिससे महाप्रभु पुनः ऐसा न कर सकें।
लज्जा और सङ्कोचसे उनका चेहरा मुर्झा गया और नेत्रोंमें जल-बिन्दु छलक आये। महाप्रभु मुँहमें दिये हुए कौरको मुराते मुराते रघुनाथकी ओर करुणाभरी दृष्टिसे निहारते पुनः हाथ मारनेको लपके और रघुनाथ 'हे प्रभो! अब तो क्षमा कीजिये' कहते हुए पतली लेकर भागे। तबतक यह सब हल्ला-गुल्ला सुनकर स्वरूप गोस्वामी भी आ पहुंचे और यह देखकर कि श्रीगौर जबरदस्ती रघुनाथका उच्छिष्टखानेका प्रयत्न कर रहे हैं, उनसे हाथ जोड़कर प्रार्थना की 'प्रभो! दया करके यह सब मत कीजिये, इसमें दूसरेका जन्म कर्म बिगड़ता है।
'चैतन्यदेवने मुखमें दिये हुए ग्रासको वातेपाते ही कहा-'स्वरूप ! तुमसे सच कहता हूँ, ऐसा सुस्वादु
अन मैंने आजतक नहीं पाया।' इसी प्रकार श्रीगौराङ्गदेवकी कृपादृष्टिसे प्रोत्साहित होते रहकर रघुनाथने वहीं पुरीमें रहकर सोलह वर्ष व्यतीत कर दिये। श्रीचैतन्य जब अहर्निश प्रेमोन्मादमें रहने लगे, तब उनकी देहरक्षाके लिये वे सदा उनके साथ हो रहने लगे। वे उनकी बड़ी श्रद्धाके साथ सेवा करते और उनके मुखसे निकले हुए वचनामृतका पान करते।
आगे चलकर श्रीगौरका तिरोभाव हो गया, जिससे रघुनाथके शोकका पार न रहा; और प्रभुके बाद जब श्रीस्वरूप भी विदा हो गये, तब तो उनका पुरीवास ही छूट गया। वे वृन्दावन चले गये इसके बाद वे वृन्दावनमें श्रीराधाकुण्डके किनारे डेरा डालकर कठोर साधनमें लग गये। वे केवल छाछ पीकर जीवन-यापन करते। रातको सिर्फ घंटे-डेढ़ घंटे सोते शेष सारा समय भजनमें व्यतीत करते। प्रतिदिन एक लाख नाम-जपका उनका नियम था।
श्रीचैतन्यचरितामृत कारका कहना है कि रघुनाथदासके गुण अनन्त थे, जिनका हिसाब कोई नहीं लगा सकता। उनके नियम क्या थे, पत्थरकी लीक थे। चार ही घड़ीमें उनका खाना, पीना, सोना आदि सब कुछ हो जाता था शेष सारा समय साधनामें व्यतीत होता था।
वैराग्यकी तो वे मूर्ति ही थे। जीभसे स्वाद लेना तो वे जानते ही नहीं थे। वस्त्र भी फटे-पुराने केवल लज्जा और शीतसे रक्षा करनेके लिये रखते थे। प्रभुकी आज्ञाको ही भगवदाज्ञा समझकर चलते थे।
इन्हें संस्कृत भाषाका ज्ञान भी बहुत अच्छा था। वृन्दावनमें रहते समय इन्होंने संस्कृतमें कई ग्रन्थ भी बनाये थे। श्रीचैतन्यचरितामृतके लेखक श्रीकृष्णदास कविराजके ये दीक्षागुरु थे। अपने ग्रन्थके लिये बहुत कुछ मसाला उन्हें इन्हीं महापुरुषसे प्राप्त हुआ था। पचासी वर्षतक पूर्ण वैराग्यमय जीवन बिताकर भगवद्धजन करते हुए अन्तमें आप भगवच्चरणोंमें जा विराजे।
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English:
In Bengal, near a place known as Thirty Bigha, there once stood a famous and immensely prosperous city called Saptagram. In this city lived two renowned and wealthy merchants, Hiranya Das and Govardhan Das. They were brothers and served as tax collectors under the then ruler of Gauda, Syed Hussain Shah. After paying twelve lakh rupees annually to the government, they retained about eight lakh rupees as profit.
An annual income of eight lakh rupees was enormous in those days. It was into this affluent family that Raghunath Das was born. Hiranya Das had no children, and Govardhan Das had only one son—Raghunath. Thus, both brothers placed all their hopes and affection upon him.
Raghunath was raised with great love and luxury. The best scholars were appointed to educate him, and he quickly mastered Sanskrit. Along with formal learning, he also received the priceless gift of devotion to God. This happened through the association of Haridas Thakur, a beloved disciple of Sri Chaitanya Mahaprabhu, who often stayed at the residence of Raghunath’s family priest. Through this holy company, the seeds of devotion to Lord Krishna were planted in Raghunath’s heart.
When news arrived that Sri Chaitanya Mahaprabhu was staying at the home of Sri Advaita Acharya in Shantipur, devotees from all around became excited. Raghunath longed to see him and sought his father's permission. Eventually, he was allowed to travel in a royal palanquin with servants and attendants.
Upon reaching Shantipur, Raghunath fell at the feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu. The Lord immediately understood the spiritual destiny awaiting the young man. However, instead of encouraging renunciation, He advised Raghunath to remain detached while living in family life and assured him that spiritual realization was possible even as a householder.
Although Raghunath returned home, his heart remained with the Lord. Fearing that he might renounce worldly life, his parents kept strict watch over him and even arranged his marriage to an exceptionally beautiful young woman. Yet nothing could remove his desire for spiritual life. He repeatedly attempted to leave home, but guards brought him back each time.
Eventually, he visited Panihati, where he met Sri Nityananda Prabhu. There he received Nityananda’s blessings and the opportunity to serve thousands of Vaishnavas by offering them the famous Dahi-Chida (flattened rice with yogurt) festival. This experience deepened his longing for complete surrender to God.
One day, by divine arrangement, all the guards fell asleep, and Raghunath escaped from his family mansion. Avoiding the main roads, he traveled through forests and remote paths toward Jagannath Puri. Covering nearly a month’s journey in only twelve days, he endured great hardship and survived on minimal food.
When he finally arrived in Puri and saw Sri Chaitanya Mahaprabhu, he was overwhelmed with joy. The Lord embraced him lovingly and entrusted his care to Svarupa Damodara, one of His closest associates.
Over time, Raghunath embraced an increasingly austere life. He gave up all comforts and eventually survived by collecting discarded remnants of Jagannath Mahaprasad, washing them, and eating only the edible grains. When Chaitanya Mahaprabhu learned of this, He personally tasted that food and declared it sweeter than anything He had ever eaten.
Raghunath spent sixteen years serving Sri Chaitanya Mahaprabhu in Puri. After the Lord's disappearance and later the departure of Svarupa Damodara, he moved to Vrindavan and settled near Radha Kund. There he practiced extraordinary renunciation, living mostly on buttermilk, sleeping very little, and spending nearly all his time in chanting and devotion.
He became one of the greatest saints of the Gaudiya Vaishnava tradition. A scholar of Sanskrit and a spiritual guide to many devotees, including Krishnadas Kaviraja, the author of the famous Chaitanya Charitamrita, Raghunath Das Goswami spent about eighty-five years immersed in devotion and finally attained the lotus feet of the Lord.
Glory to Sri Krishna, Sri Chaitanya Mahaprabhu, and the great saint Raghunath Das Goswami! 🙏🌷
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