क्या सिर्फ नाम जप से बदल सकता है आपका पूरा जीवन? | Can Simply Chanting God's Name Change Your Entire Life?
Hindi:
आजकल नाम जप का अच्छा-खासा ट्रेंड चल निकला है। विशेषकर प्रेमानन्द जी महाराज के वायरल वीडियो में इस बहुत जोर दिया जाता है। हमारे सनातन समाज मे गुरु-शिष्य परंपरा में सदियों से इसका चलन है। कहा जाता है कि बिना किसी गुरु से दीक्षा किए 'नाम जप';नहीं करना चाहिए। लेकिन इससे आम सहमति अनिवार्य नहीं है।
क्योंकि डाकू रत्नाकर ने कभी 'मरा, मरा' जपकर भी 'राम' को साध लिया था। और महर्षि वाल्मीकि बनकर रामायण जैसे पवित्र महाकाव्य की रचना की थी। हां, इतना अवश्य है कि नाम जप के लिए किसी भी साधक का मन, वचन व कर्म से शुद्ध होना अनिवार्य है। बहुत कम यानी जीने लायक भर सात्विक आहार लेना, सम्यक वाणी और नैतिक आचरण की अपेक्षा की जाती है।
ज्योतिषी केएन राव के मंत्र गुरु स्वामी परमानंद सरस्वती ने उन्हें नाम जप को लेकर आवश्यक निर्देश दिए थे। इसका अनुभव श्री राव ने अपनी पुस्तक 'योगी, प्रारब्ध एवं कालचक्र' में किया है।
वे लिखते हैं, "चलते-फिरते या लेटे हुए गहरी, अधिक गहरी और सर्वाधिक गहरी सांसें लेने पर स्वयं को एकाग्र करें, साथ में जप करते रहें। एक बार श्वास लेते समय, एक बार छोड़ते समय। इसे कम से कम एक घंटे या इससे अधिक, तब तक करें जब तक आपको मस्तिष्क में रिक्तता (शून्यता) का अनुभव न होने लगे।
1. जिस दौरान मुझमें शरीर विषयक चैतन्यालोप को उत्प्रेरित किया गया था, उस समय मैंने लयबद्ध गहरी श्वास, जिसका मेरे शरीर के संचालन में, विशेष तौर पर नपे-तुले कदमों के साथ सुर में सुर मिला हुआ था, का अधिकतम लाभ अनुभव किया।
2. बिस्तर में लेटे हुए इसे और अच्छी तरह किया जा सकता है। सीधे लेट जाएं, सिर के नीचे एकदम पतली सी तकिया लें या बिल्कुल न लें। अपनी आंखें बंद कर लें। मानसिक रूप से भ्रूमध्य (दोनों भौहों के बीच) में ध्यान एकाग्र करें। और निरंतर चालीस मिनट की अवधि तक जप करें।
3. अब इसे बंद कर दें और अपनी श्वास के स्वाभाविक प्रवाह पर ध्यान दें। इसका प्रवाह अब बहुत धीमा और हल्का हो सकता है। जब तक ले सकते हैं, इसका आनंद लें। आप स्पष्ट रूप से पाएंगे कि आपकी आंखों की पुतलियों में कोई हलचल नहीं है, मस्तिष्क में रिक्तता (शून्यता) का भाव, रिक्त (शून्य) एकटक दृष्टि में भी प्रतिबिंबित होता है।
4. अब पुनः गहरी श्वास लेना शुरू करें। कम से कम आधे घंटे तक यह जारी रखें, फिर इसे बंद कर दें। और पुनः अपनी श्वास का इसी तरह अवलोकन करें।
5. इसे प्रतिदिन कई बार और लंबे समय तक करें। आप इसे बैठे हुए, चलते-फिरते, लेटे या कुछ भी करते हुए कर सकते हैं। आपकी एकाग्रता गुरु मंत्र के साथ लयबद्ध श्वास पर होनी चाहिए।
6. कुछ समय बाद आप गौर करेंगे कि आपकी रीढ़ का मध्यभाग जिसे सुषुम्ना के नाम से जाना जाता है। ऊर्जा की तरंगों को ऊपर की ओर प्रक्षेपित कर रहा है। यह एक अतिसुंदर लक्षण है, कुंडलिनी के जागरण का, जो सक्रिय रूप से ऊर्ध्व (नीचे से ऊपर की ओर) दिशा में गति करती है।
7. इस अभ्यास को कभी छोड़ें नहीं, इसे जीवनपर्यन्त के लिए एक आदत बना लें। “ध्यानं जपज्योतिषम्” सब प्रकार के यज्ञों में… जपयज्ञ हूँ", ऐसा भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है (अध्याय 10)। सिख गुरु तेग बहादुर ने इसे अपने एक भजन में गाया है, “श्वास श्वास सुमिरो गोविंद।”
नोट- कुंडलिनी जागरण चेतना के उच्च स्तर पर पहुंचने की एक स्थिति है। जहां जाकर कोई साधक योगी, संत बन जाता है। इसके लिए क्रमशः सात चक्रों को जागृत करना होता है, पहला, मूलाधार, दूसरा, स्वाधिष्ठान, तीसरा, मणिपुर चक्र, चौथा, अनाहत, पांचवा, विशुद्धि चक्र, छठा, आज्ञा, सातवां, सहस्रार। इसमें किस स्तर पर साधक को सफलता मिलेगी यह उसके प्रारब्ध, गुरु कृपा, उचित साधना पर निर्भर करता है। वैसे यह कई जन्मों का 'खेल' है।
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English:
Nowadays, chanting the Divine Name (Naam Jap) has become quite a popular trend, especially through the viral videos of Premanand Ji Maharaj, where great emphasis is placed on it. In our Sanatan tradition, the guru-disciple lineage has practiced this for centuries. It is often said that one should not perform Naam Jap without receiving initiation (diksha) from a guru. However, this is not necessarily a universally accepted rule.
