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भगवान श्रीकृष्ण के अथक प्रयत्नों के बाद भी महाभारत का महासंग्राम टल न सका। इस बात से महामुनि उत्तंक के हृदय में तीव्र आक्रोश उमड़ रहा था। उन्हें लगता था कि यदि स्वयं नारायण चाह लेते, तो यह विनाश रुक सकता था।
संयोगवश उसी समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारिका की ओर जाते हुए मुनि उत्तंक के आश्रम पर आ पहुँचे।
उन्हें देखते ही मुनि के संयम के बाँध टूट गए। कटु स्वर में बोले—
“आप सर्वशक्तिमान होकर भी इस युद्ध को रोक न सके! क्या आपको इसके लिए शाप देना अनुचित होगा?”
श्रीकृष्ण मंद मुस्कान के साथ बोले—
“महामुनि! जब किसी को विवेक दिया जाए, सत्य का मार्ग दिखाया जाए, और फिर भी वह उसे ठुकरा दे, तो उस अपराध का भार मार्गदर्शक पर कैसे डाला जा सकता है?
यदि मुझे ही सब कुछ कर देना होता, तो इस संसार में मनुष्य को कर्म और निर्णय का अधिकार क्यों दिया जाता?”
परंतु उत्तंक का क्रोध शान्त न हुआ। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे शाप देकर ही मानेंगे।
तब भगवान ने अपना दिव्य विराट स्वरूप प्रकट किया और गंभीर स्वर में बोले—
“मैंने आज तक किसी का अहित नहीं किया। जो निष्पाप होता है, वह पर्वत के समान अडिग होता है। आप चाहें तो शाप देकर देख लें—मेरा कुछ भी अनिष्ट नहीं होगा।
हाँ, यदि किसी वरदान की इच्छा हो, तो अवश्य कहिए।”
मुनि ने कहा—
“यदि ऐसा है, तो इस निर्जल मरुस्थल को भी हरा-भरा कर दीजिए। यहाँ जल-वृष्टि हो।”
कृष्ण ने सहज भाव से कहा—“तथास्तु।”
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और वहाँ से प्रस्थान कर गए।
कुछ समय बाद एक प्रातः महामुनि भ्रमण हेतु निकले। सहसा धूलभरी आँधी उठी और वे दिशा भ्रम में मरुस्थल में भटक गए। जब आँधी थमी, तो चारों ओर न निर्जलता थी, न जीवन—केवल तपती रेत और प्रचंड धूप।
प्यास से व्याकुल होकर उनके प्राण संकट में पड़ने लगे।
तभी उन्होंने देखा—एक चाण्डाल चमड़े के पात्र में जल लेकर सामने खड़ा है और विनम्र स्वर में जल पीने का आग्रह कर रहा है।
मुनि क्रोधित हो उठे—
“दूर हट! नीच जाति के होकर मुझे जल देने आया है! अभी शाप देकर भस्म कर दूँगा!”
क्रोध के साथ उनके मन में कृष्ण के प्रति भी रोष उमड़ पड़ा—
“उस दिन मुझे छल कर चले गए, आज मेरी परीक्षा ले रहे हैं।”
जैसे ही उन्होंने शाप देने के लिए मुख खोला—
सामने भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो गए।
शांत स्वर में बोले—
“महामुनि! आप ही तो कहते हैं कि आत्मा ही आत्मा को पहचानती है, आत्मा ही इन्द्र है और आत्मा ही परमात्मा।
फिर बताइए—क्या इस चाण्डाल की आत्मा में इन्द्र नहीं थे?
यही इन्द्र आपको अमृत पिलाने आए थे, और आपने उन्हें ठुकरा दिया।”
यह कहकर भगवान अदृश्य हो गए—और साथ ही वह चाण्डाल भी।
मुनि उत्तंक स्तब्ध रह गए। उनके हृदय में पश्चाताप की अग्नि जल उठी। उन्होंने अनुभव किया कि—
“मैंने जाति, ज्ञान और तप के अहंकार में शास्त्रों को केवल पढ़ा, जिया नहीं।
यदि कौरव और पाण्डव भी श्रीकृष्ण के उपदेश को आचरण में न ला सके, तो उसमें भगवान का क्या दोष?”
उन्होंने अंततः सत्य को स्वीकार किया—महापुरुष केवल दिशा दिखाते हैं।
चलना स्वयं पड़ता है।
जो प्राप्त ज्ञान को व्यवहार में न उतारे, वह स्वयं ही उसके फल से वंचित रह जाता है।
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